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रिटायर होंगी चांसलर एंजेला मर्केल

बर्लिन. जर्मनी में 16 साल तक एकछत्र राज करने वाली चांसलर एंजेला मर्केल अब रिटायर होने जा रही तैयार हैं. 26 सितंबर को जर्मनी होने जा रहे आम चुनावों में मतदाताओं के मन में एक ही सवाल है कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर अब कौन आएगा. जर्मनी का ये आम चुनाव देश और यूरोपीय संघ की स्थिरता पर भी प्रभाव डालेगा. एंजेला मर्केल इस बार चुनाव में खड़ी नहीं हो रही हैं. जर्मन इतिहास में पहली बार मर्केल ‘वोर्पोमर्न-रुगेन-वोर्पोमर्न-ग्रीफ़्सवाल्ड’ संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार नहीं होंगी, जहां से उन्होंने 1990 में पूर्वी जर्मनी के जुड़ने के बाद से लगातार प्रतिनिधित्व किया है.

रविवार को मतदान ने मर्केल के मध्य-दक्षिणपंथी दल यूनियन ब्लॉक और मध्य-वामपंथी दल सोशल डेमोक्रेट्स के बीच एक बहुत करीबी दौड़ की ओर इशारा किया. यूनियन ब्लॉक की ओर से आर्मिन लास्केट चांसलर पद की दौड़ में हैं. वहीं, दूसरे दल की ओर से निवर्तमान वित्त मंत्री और वाइस चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ उम्मीदवार हैं.

हाल के सर्वेक्षणों में सोशल डेमोक्रेट्स को मामूली रूप से आगे दिखाया गया है. करीब 8.3 करोड़ लोगों की आबादी वाले देश में करीब 6.04 करोड़ लोग संसद के निचले सदन के सदस्यों को चुनने की पात्रता रखते हैं, जो सरकार के प्रमुख को चुनते हैं.

चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है. यह दिखाता है कि गठबंधन वाली सरकार संभावित है और इस क्रम में नई सरकार के गठन के लिए कई हफ्ते या महीने का समय लग सकता है. जब तक नई सरकार का स्वरूप तय नहीं होता तब तक मर्केल कार्यवाहक प्रमुख रहेंगी.

जर्मनी में 299 चुनावी जिले हैं. बैलेट पेपर पर 47 पार्टियों के चुनाव चिन्ह सूचीबद्ध होंगे. प्रत्येक वोटर एक बैलेट पेपर पर दो वोट डालेगा- एक अपने निर्वाचन क्षेत्र में खड़े उम्मीदवार के लिए और एक अपने संघीय राज्य में उम्मीदवारों के पार्टी लिस्ट के लिए. कम-से-कम 5% वोट की लिमिट उन पार्टियों की संख्या को सीमित करती है, जो वोटिंग के बाद अपने एक प्रतिनिधि को बुंडेस्टैग (जर्मनी की संसद) में भेज सकती हैं. जर्मनी के पॉलिटिकल पंडितों का मानना है कि 6 पार्टियां इस लिमिट को पार कर सकती हैं.

जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है. सबसे बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों में से एक है. 1700 से अधिक जर्मन कंपनियां भारत में सक्रिय हैं. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 400,000 नौकरियां देती हैं. जर्मनी में सैकड़ों भारतीय व्यवसाय सक्रिय हैं और उन्होंने आईटी, ऑटोमोटिव और फार्मा क्षेत्रों में अरबों यूरो का निवेश किया है.

हालांकि यूरोपीय संघ और भारत के बीच एक मुक्त व्यापार समझौते पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है. इस साल मई में, यूरोपीय कमीशन और भारतीय सरकार ने FTA पर बातचीत को फिर से शुरू करने की इच्छा जाहिर की थी, जो 2013 से रुकी हुई है. अर्थव्यवस्था के अलावा जर्मनी भारत के लिए सामरिक रूप से भी अहम पार्टनर है.

यही कारण है कि भारत जर्मनी के आम चुनाव के परिणामों पर पैनी नजर रखेगा. एंजेला मर्केल के बिना भारत संबंधित रणनीति को ठोस कार्रवाई में बदलना जर्मनी की अगली सरकार के लिए एक चुनौती होगी. इसके अलावा भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड के बारे में जर्मनी की चिंताएं मर्केल कार्यकाल के बाद के संबंधों को किस हद तक प्रभावित कर सकती हैं, इसपर भी भारत की नजर होगी.

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