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इस तकनीक से पूरी दुनिया को रोशन करेगा भारत!

बीते कुछ दिनों से देश के थर्मल पावर प्लाटों के सामने कोलये की कमी का संकट बना हुआ है. इस कारण बिजली बीते कुछ दिनों से देश के थर्मल पावर प्लाटों के सामने कोलये की कमी का संकट बना हुआ है. इस कारण बिजली उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है. इस कारण भविष्य में बिजली उत्पादन के नए तरीकों को अपनाने पर चर्चा होने लगी है. इस बीच चीन से एक उत्साहित करने वाली खबर है. पड़ोसी देश चीन में थोरियम आधारित परमाणु बिजली संयंत्र का परीक्षण किया जा रहा है. दुनिया में अभी तक यूरेनियम आधारित बिजली संयंत्रों से बिजली उत्पादन किए जा रहे हैं, लेकिन थोरियम आधारित परमाणु संयंत्र अपने आप में ऊर्जा उत्पादन की दुनिया में एक बेहद क्रांतिकारी कदम है.

अगर चीन की यह तकनीक सफल हो जाती है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत उठा सकता है. इस तकनीक के जरिए भारत के पास पूरी दुनिया की बिजली जरूरतों को पूरा करने तक की क्षमता आ सकती है.

मुताबित दुनिया के वैज्ञानिक चीन के इस प्रयोग से उत्साहित हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक परमाणु बिजली घरों में थोरियम का परीक्षण पहले किया जा चुका है लेकिन चीन पहला देश है जो इस व्यावसायिक उद्देश्य से थोरियम आधारित परमाणु संयंत्र लगा रहा है. चीन प्रयोगिक तौर पर स्थापित इस संयंत्र से फिलहाल 2 मेगावाट बिजली उत्पादन करने जा रहा है.

यूरेनियम आधारित परमाणु संयंत्र की तुलना में थोरियम आधारित संयंत्र के भीतर पानी की जगह तरल सॉल्ट का इस्तेमाल होता है. इसमें परमाणु ऊर्जा पैदा करने की क्षमता होती है और अपेक्षाकृत सुरक्षित और सस्ता भी होता है. इतना ही इससे यूरेनियम की तुलना में काफी कम रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है.

चीन ने वुवेई प्रांत में गोबी मरूस्थल के बाहरी इलाके में इस रिएक्टर को लगाया है. इस रिएक्टर का ट्रायल रन चल रहा है. जानकारों का कहना है कि अगले 50-100 सालों के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है. उनका कहना है कि थोरियम, यूरेनियम की तुलना में काफी ज्यादा समृद्ध होता है. सिडनी स्थिति ऑस्ट्रेलियन न्यूक्लियर साइंस एंड टेक्नोलॉजी ऑर्गेनाइजेशन के परमाणु इंजीनियर लिंडन एडवर्ड्स कहना है कि यह एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन इस तकनीक को मूर्त रूप लेने में दशकों लग सकते हैं. ऐसे में हमें अभी से काम शुरू कर देना चाहिए.

चीन ने वर्ष 2011 में तरल सॉल्ट रिएक्टर प्रोग्राम की शुरुआत की थी. उस वक्त उसने इस पर करीब 50 करोड़ डॉलर का निवेश किया था. चीन के इस रिएक्टर का संचालन शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लायड फिजिक्स ने वेवेई स्थित इस रिएक्टर को डिजाइन किया है. इससे फिलहाल केवल दो मेगावाट थर्मल ऊर्जा का उत्पादन होगा.

यह करीब 1000 घरों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है. अगर पूरा प्रयोग सफल हो जाता है तो चीन 2030 तक 373 मेगावाट क्षमता का रिएक्टर लगाने की योजना बना रहा है. इससे कई हजार घरों की जरूरतें पूरी हो जाएंगी.

दरअसल, चीन में अगर यह तकनीक सफल हो जाती है तो भारत भी इसका भरपूर इस्तेमाल कर सकता है. भारत में थोरियम का प्रचूर भंडार उपलब्ध है. एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के थोरियम भंडार का 25 फीसदी केवल भारत में ही है.

परमाणु ऊर्जा विभाग के मुताबिक भारत में एक करोड़ टन मोनाजाइट है जिसमें 9,63,000 टन थोरियम ऑक्साइड भरा हुआ है. दूसरी तरफ भारत में यूरोनियम का भंडार काफी कम है. भारत को अपने परमाणु संयंत्रों के लिए यूरेनियम की जरूरत पूरा करने के लिए ऑस्ट्रेलिया और रूस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है.

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