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राज्यों का रोल, ‘कोयला संकट’ की कई वजहें

 

नई दिल्ली. देश में कोयले की किल्लत को लेकर बवाल मचा हुआ है. अब सरकार के सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि लंबे चले मानसून और विदेश कोयले की बढ़ी कीमत के कारण भी ये किल्लत पैदा हुई है. जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम कम थे तब कंपनियां और राज्य सरकारें बाहर से कोयला खरीद रहे थे. अब जब कीमत बढ़ गई है तो घरेलू कोयले की तरफ देखा जा रहा है.

सूत्रों का यह भी कहना है कि कई राज्य खदानों में पर्याप्त खुदाई नहीं करवा रहे साथ ही वो कोल इंडिया से भी स्टॉक नहीं ले रहे जबकि इसके लिए रिमाइंडर दिया गया. दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों ने मुख्य कोयला प्लांट बंद कर दिए थे. राज्यों को कोल इंडिया का बकाया 20 हजार करोड़ रुपए अदा करना है.

कोयला मंत्रालय बीते जनवरी महीने से राज्यों से कह रहा है कि वो कोल इंडिया से स्टॉक उठाएं लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. कोल इंडिया भी एक सीमा तक ही स्टॉक कर सकता है क्योंकि एक सीमा से ज्यादा कोयले में आग लगने का खतरा होता है. झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कोयले की खदानें हैं लेकिन यहां पर माइनिंग बेहद कम हुई.

राज्यों की सभी मांगें केंद्र सरकार पूरी कर रही है. बीते चार दिनों में कोल स्टॉक बढ़ना शुरू हो गया है. कुछ महीने में स्थितियां सामान्य हो जाएंगी. रोजाना की बिजली और कोयला सप्लाई की कोई कमी नहीं है. केंद्र सरकार कोल प्रोडक्शन 1.94 मिलियन टन से 2 मिलियन टन अगले पांच दिनों में बढ़ाएगी. बढ़े कर्ज के बावजूद किसी भी राज्य को सप्लाई नहीं रोकी गई थी.

इससे पहले केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी कहा कि बारिश के कारण कोयले की कमी हो गई, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 60 रुपये से 190 रुपये प्रति टन की वृद्धि हुई. उन्होंने बताया कि इसके बाद, आयातित कोयला बिजली संयंत्र या तो 15-20 दिनों के लिए बंद हो गए या बहुत कम उत्पादन करने लगे. इससे घरेलू कोयले पर दबाव पड़ा.

देश में कोयले के संकट के मद्देनजर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह और केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और कोयले के परिवहन को बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की.

 

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